फैजान ए जुमा पीडीऍफ़ डाउनलोड Faizan e Jumma PDF Dawateislami

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फैजान ए जुमा – शैतान सुस्ती दिलाएगा मगर आप येह रिसाला ! (26 सफहात) पूरा पढ़ कर ईमान ताजा कीजिये

जुमुआ को दुरूद शरीफ़ की फ़ज़ीलत

नबियों के सुल्तान, रहमते आ-लमियान, सरदारे दो जहान, महबूबे रहमान का फरमाने ब-र-कत निशान है : जिस ने मुझ पर रोजे जुमुआ दो सो200 बार दुरूदे पाक पढ़ा उस के दो सो 200 साल के गुनाह मुआफ होंगे।

صلوا على الحبيب صلى الله تعالى على محمد

मीठे मीठे इस्लामी भाइयो ! हम कितने खुश नसीब हैं कि अल्लाह तबा-र-कवतमाला ने अपने प्यारे हबीब के सदके हमें जुमुअतुल मुबारक की नेमत से सरफ़राज़ फ़रमाया । अफ्सोस ! हम ना क़दरे जुमुआ शरीफ को भी आम दिनों की तरह गुफ्लत में गुजार देते हैं हालां कि जुमुआ यौमे ईद है, जुमुआ सब दिनों का सरदार है, जुमुआ के रोज़ जहन्नम की आग नहीं सुलगाई जाती, जुमुआ की रात दोज़ख के दरवाजे नहीं खुलते, जुमुआ को बरोज़े क़ियामत दुल्हन की तरह उठाया जाएगा,

  • जुमुआ के रोज मरने वाला खुश नसीब मुसल्मान शहीद का रुत्वा पाता
  • और अज़ाबे कब से महफूज़ हो जाता है। मुफस्सिरे शहीर हकीमुल उम्मत हज़रते मुफ्ती
  • अहमद यार खान के फरमान के मुताबिक, जमुआ को हज हो तो
  • इस का सवाब सत्तर हज के बराबर है, जुमुआ की एक नेकी का सवाब सत्तर गुना है।
  • (चूंकि जुमुआ का शरफ बहुत ज्यादा है लिहाज़ा) जुमुआ के रोज़ गुनाह का अज़ाब भी सत्तर गुना है।

(मुल अन् मिरआत, नि. 2. स. 323, 325, 336)

फैजान ए जुमा पीडीऍफ़ – Faizan e Jumma

फैजान ए जुमा पीडीऍफ़ डाउनलोड Faizan e Jumma PDF Dawateislami = जुमुअतुल मुबारक के फ़ज़ाइल के तो क्या कहने! अल्लाह a. ने जुमुआ के मु-तअल्लिक एक पूरी सूरत “सूरतुल जुमुअह” नाज़िल फ़रमाई है जो कि कुरआने करीम के 28वें पारे में जगमगा रही है। अल्लाह तबा-र-क व तआला सूरतुल जुमुअह की आयत नम्बर 9 में इर्शाद फ़रमाता है :

तर-ज-मए कन्जुल ईमान : ऐ ईमान वालो ! जब नमाज़ की अजान हो जुमुआ के दिन तो अल्लाह के ज़िक्र की तरफ दौड़ो और खरीद व फरोख्त छोड़ दो, येह तुम्हारे लिये बेहतर है अगर तुम जानो ।

जुमुआ के माना – फैजान ए जुमा

मुफ़स्सिरे शहीर हकीमुल उम्मत हज़रते मुफ्ती अहमद यार खान फ़रमाते हैं :

  • चूंकि इस दिन में तमाम मख्लूकात वुजूद में मुज्तमअ (यानी इकठ्ठी) हुई कि
  • तक्मीले खल्क इसी दिन हुई नीज हजरते आदम की मिट्टी
  • इसी दिन जम्अ हुई नीज़ इस दिन में लोग जम्भ हो कर नमाज़े जुमुआ अदा करते हैं,
  • इन वुजूह से इसे जुमुआ कहते हैं। इस्लाम से पहले अहले अरब इसे अरूबह कहते थे।

(मिरआतुल मनाजीहू, जि. 2. स. 317)

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